3/21/2009

उत्तर प्रदेश में पुराने ढर्रे पर लौटी भाजपा

उत्तर प्रदेश में पुराने ढर्रे पर लौटी भाजपा

सद्गुरु शरण, लखनऊ पिछले चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग के कई टोने-टोटके करके थक-हार चुकी भाजपा ने अंतत: अपना परंपरागत सवर्ण वोट बैंक वापस पाने की रणनीति अख्तियार कर ली है। इस मोर्चे पर बसपा को दो-दो हाथ करने का न्योता देने की मुद्रा में पार्टी ने अब तक घोषित 61 उम्मीदवारों में तैंतीस टिकट सवर्णो को दिए हैं। इसमें 25 फीसदी ब्राह्मण हैं।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डा. रमापति राम त्रिपाठी स्वीकार करते हैं कि उम्मीदवार चयन में सामाजिक संतुलन का ध्यान रखते हुए पार्टी ने अपने परंपरागत वोट बैंक को खास महत्व दिया है।
90 के दशक में सवर्ण एवं अति पिछड़ी जातियों के समर्थन से सत्ता के शिखर तक पहुंची भाजपा ने 2002 विधानसभा चुनाव, 2004 लोकसभा चुनाव और 2007 विधानसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग को लेकर कई प्रयोग किए। लेकिन उनके नतीजे पार्टी के लिए प्रतिकूल रहे।
भाजपा की इस दुविधा का लाभ उठाकर बसपा ने गत विधानसभा चुनाव में दलित-ब्राह्मण वोट बैंक जोड़ने का प्रयोग किया और कामयाबी भी मिली।
अब भाजपा ने अपने रूठे वोट बैंक को मनाने के लिए दो तरह की रणनीति बनाई है। पार्टी अपने कोटे की 70 में आधे से ज्यादा सीटों पर सवर्ण उम्मीदवार उतार रही है। जबकि अति पिछड़ी जातियों को खुश करने के लिए पार्टी अपने सहयोगी दलों पर आश्रित है।
भाजपा के 61 घोषित उम्मीदवारों में पंद्रह ब्राह्मण, बारह ठाकुर और छह वैश्य शामिल हैं। पार्टी ने अति पिछड़ी जातियों के 11 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है।
अति पिछड़ी जातियों के मामले में भाजपा को यह सुविधा है कि राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन के कारण पश्चिमी अंचल में पार्टी को जाट वोट बैंक का समर्थन मिलने की उम्मीद है। वहीं जद-यू कोटे की सीटों पर भी पिछड़ी जातियों के कम से कम दो उम्मीदवार मैदान में उतरने की संभावना है।
अब तक घोषित उम्मीदवारों में छह सिटिंग सांसदों सहित सिर्फ 13 पुराने चेहरे हैं। पार्टी ने 2004 लोकसभा चुनाव हार चुके 67 में सिर्फ सात उम्मीदवारों पर इस बार भी भरोसा किया, जिनमें डा. मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, सत्यदेव सिंह, मनोज सिन्हा और लल्लू सिंह जैसे कद्दावर नेता शामिल हैं।

No comments: