3/29/2010

Government of India is changing its Afghan policy

आधिकारिक स्रोतों को उध्दृत करते हुए समाचार रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि भारत सरकार अपनी अफगान नीति में परिवर्तन कर रही है और उसने तालिबान तथा गुलबुद्दीन हिकमतयार की अध्यक्षता वाले हिज्ब-ए-इस्लामी गु्रप के साथ बातचीत करने की इच्छा दर्शायी है।
 
सरकार को इस बारे में स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता है। जैसा कि रिपोर्टों ने दर्शाया है, यदि यह सही है तो भारत की अफगान नीति में हुए इस बदलाव का खुलासा लोगों के सामने किया जाना चाहिए और विदेश मंत्री को उन प्रतिगामी तत्वों से बातचीत के प्रति इच्छा दर्शाने के raison d’être` का उत्तर देना चाहिए, जो आई.एस.आई के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और जिनके भारत विरोधी कार्यों ने पिछले दो दशकों से हमें लहु-लुहान कर रखा है।
 
तालिबान के साथ वार्ता किए जाने से वह सब उलट गया है, जिस पर भारत अब तक डटा हुआ था। वे ओसामा के आदमी हैं, वे अपनी औरतों को पर्दे के पीछे धकेलते हैं, उन्हें स्कूल जाने से रोकते हैं, उनकी दुनिया एक अंधेरे की दुनिया है, जो समाज को मध्य युग में पहुंचाती है और जो लोकतंत्र तथा बहुलवाद से बहुत दूर है। वे नशीली दवाओं के बदले प्राप्त धन पर जीवित रहते हैं और उनकी सहायता के प्रमुख स्रोत में पाकिस्तान की आई.एस.आई. मुख्य रूप से शामिल है। भारत के प्रति उनका जिहाद जग-जाहिर है।
 
यह विश्वास करते हुए कि अमेरिका अफगानिस्तान को बहुत जल्द छोड़ सकता है, Post-US Strategy की योजना बनाना नौसिखियापन है। भारत अब तक अफगानिस्तान में 1.2 बिलियन डॉलर से भी अधिक का निवेश कर चुका है। यह तर्कसंगत है कि हमें यह जानकारी होनी चाहिए कि वहां भारत क्या प्राप्त करना चाहता है जहां पर भारत की भूमिका को अत्यधिक प्रभाव वाली अमेरिकन उपस्थिति और अमेरिकन कार्यों ने हाशिए पर लाकर छोड़ दिया है।
 
इसके अतिरिक्त, गुलबुद्दीन हिकमतयार का ग्रुप हिज्ब-ए-इस्लामी बहुत थोड़े प्रभावहीन लोगो के निरर्थक गुट के रूप में सिमटकर रह गया है। यह उल्लेखनीय है कि गुलबुद्दीन हिकमतयार ने 1975 में पाकिस्तान में आई.एस.आई. और सी.आई.ए. के साथ मिलकर अफगान में रूसी सैनिकों से लड़ने के लिए हिज्ब-ए-इस्लामी की स्थापना की थी। रिपोर्टों के अनुसार 11 सितंबर, 2001 की घटनाओं के फलस्वरूप पश्तून नस्ल के हिकमतयार ने तालिबान नेता मौहम्मद उमर और देश में कायदा ग्रुप के शेष बचे लोगों के साथ कोइलेशन विरोधी गठबंधन बनाया था। अमेरिका ने उसको अलकायदा को उसके पिछले समर्थन के कारण फरवरी 2003 में आतंकवादी घोषित किया था। 19 फरवरी, 2003 को यह घोषणा की गई थी कि अमेरिकी सरकार के पास ऐसा संकेत देने वाली सूचना है कि गुलबुद्दीन हिकमतयार ने अलकायदा और तालिबान द्वारा किए गए आतंकवादी कृत्यों में भाग लिया था और उनका समर्थन किया था। उसके आतंकवादी कार्यकलापों के कारण अमेरिका ने हिकमतयार को Specially Designated Global Terrorist  के रूप में पदनामित कर दिया था। भारत के Intelligence intercepts से भी खुलासा हुआ था कि आई.एस.आई. कर्मचारी भारत के विरूध्द और अफगान स्थित भारतीय प्रतिष्ठानों के विरूध्द हमला करने के लिए न केवल लश्करे-तैय्यबा के साथ बल्कि अफगानिस्तान के अन्य ग्रुपों के साथ भी निरंतर संपर्क में हैं। इनमें से सबसे पहला गत वर्ष सितंबर में कुनार में हुआ था, जिसमें आई.एस.आई., तालिबान नेताओं और हिज्ब-ए-इस्लाम गुलबुद्दीन जैसे तत्वों की आवभगत लश्करे तैय्यबा ने की थी, जिसका अध्यक्ष आई.एस.आई. लैकी और रैबिड इंडिया-बेटर गुलबुद्दीन हिकमतयार है।
 
ये वे ही लोग हैं, जो पत्थर मारकर, लैम्प पोस्ट से लटकाकर मृत्यु देने जैसे समरी पनिशमेंट देते है तथा बामियान को ध्वस्त करते हैं। ये लोग काबुल में भारतीयों को मारने के भी जिम्मेवार थे। क्या भारत सरकार को उनके साथ वार्ता शुरू करनी चाहिए?
 
यदि भारत के पास अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बारे में कोई रणनीति है तो वह प्रमुखतया भारतीय हितों को सुरक्षित रखने और भारत विरोधी आतंकवादी ग्रुपों का उन्मूलन सुनिश्चित करने के लिए होनी चाहिए। खून के प्यासे तत्वों के साथ कोई वार्ता नहीं होनी चाहिए। हेडली मुद्दे की विफलता और अमेरिकी दबाव के तहत पाकिस्तान के साथ निरर्थक वार्ता के पश्चात् संप्रग की भारत विरोधी तत्वों के साथ कभी खत्म न होने वाले समझौतावादी रवैयों की यह एक अन्य स्तब्धकारी घटना है।  
 
         (श्याम जाजू)
    मुख्यालय प्रभारी
 

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